जो अल्लाह के लिए छोटा बनेगा, वही बुलंदी पाएगा: तौहीद नदवी
वो मुसलमान नहीं जिसके शर से पड़ोसी महफ़ूज़ न हो : मुफ़्ती राशिद हुसैन नदवी
मोहम्मद आलम
अयोध्या। रूदौली नगर के मोहल्ला शेखाना महक उठी। यहां जलसाए सीरतुन नबी व मदहे सहाबा बड़े ही अदब और एहतराम के साथ आयोजित हुआ। शुरुआत हाफ़िज़ जकरिया कासमी की तिलावत-ए-कुरान पाक से हुई तो पूरा माहौल कुरान की आयतों की गूंज से रौशन हो गया। सदारत मुफ़्ती राशिद हुसैन नदवी और संचालन मौलाना खादिम नदवी ने किया।
जलसे को ख़िताब करते हुए मुफ़्ती राशिद हुसैन नदवी ने पड़ोसी के हुकूक़ पर जोर देते हुए कहा, वो मुसलमान है ही नहीं जिसके शर से उसका पड़ोसी महफ़ूज़ न हो। उन्होंने माँ–बाप की खिदमत को सबसे अहम फ़र्ज़ बताते हुए कहा कि उन्हें तकलीफ़ देना, यहाँ तक कि उफ़्फ़ कहना भी गुनाह है।
मुफ़्ती नदवी ने कहा, तुममें सबसे बेहतर वही है जो अपने घरवालों के लिए सबसे बेहतर हो। उन्होंने बताया कि नमाज़ हमारी अपनी इबादत है, लेकिन समाज में बदलाव अच्छे आमाल से आएगा। मुसलमान झूठ न बोले और नाप-तौल में कमी न करे यही असल इस्लामी तालीम है।
तौहीद आलम नदवी ने कहा कि हक़ की आवाज़ उठाने वाला मुश्किलों से गुज़रता है, लेकिन यही अल्लाह का इम्तिहान होता है। जो अल्लाह के लिए छोटा बन जाएगा, अल्लाह उसे बुलंदी तक पहुँचा देगा, उन्होंने कहा। उन्होंने शेख़ मख़्दूम अहमद अब्दुल हक़ रूदौलवी की मिसाल देते हुए कहा कि हमें दिल को पाक-साफ़ रखकर हर इंसान के लिए मोहब्बत पैदा करनी चाहिए। उन्होंने औलाद की तालीम व तरबियत पर भी जोर दिया कि बच्चों को रोज़ाना कम से कम एक घंटा दीनी तालीम ज़रूर दी जाए, वरना क़यामत के दिन यही औलाद अपने वालिदैन के खिलाफ गवाही देगी।
मौलाना शब्बीर नदवी ने कहा कि नबी की मोहब्बत के बिना हर चीज़ अधूरी है और हमें नबी के बताए रास्ते पर चलकर ज़िंदगी गुज़ारनी चाहिए।
मुफ़्ती मोहम्मद फुरकान और मुफ़्ती अहसन अब्दुल हक़ ने भी सीरत-ए-नबी और सहाबा की ज़िंदगी को अपनाने की अहमियत पर बयान किया। वहीं उमर अब्दुल्ला बाराबंकवी ने नात-ए-पाक पेश कर महफ़िल को रूहानी कैफ़ियत से भर दिया। अंत में दुआ के साथ जलसे का समापन हुआ। बड़ी तादाद में उलमा-ए-कराम, बुजुर्गान और अवाम ने शिरकत की। वक्ताओं ने आयोजक हाफ़िज़ मोहम्मद जलीस आसिफ़ को बेहतरीन और कामयाब जलसे के लिए मुबारकबाद पेश की। इस मौके पर सूफी मुईनउद्दीन, हाफ़िज़ फुरकान, हाफ़िज़ अदनान, मौलाना फ़ैज़ान इमाम ईदगाह दरियाबाद, हाफ़िज़ अब्दुल मन्नान, हाफ़िज़ शारिक, अकरम, शरफ़ुद्दीन, शान मोहम्मद, मशीउद्दीन, गुफ़रान, असद, ज़ीशान, शमीम, मो. आमिर समेत सैकड़ों लोग मौजूद रहे।